अवैध खनन से ज्यादा रेत के मनमाने दाम से आहत है वोटर

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०-दिनेश गुप्ता
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। मध्यप्रदेश में इस बार चुनाव किसी एक मुद्दे कोक फोकस कर नहीं लड़ा गया है। कह सकते हैं कि चुनाव पूरी तरह से सामान्य हालातों में लड़ा गया है। इस कारण किसी के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई मजबूत लहर दिखाई नहीं दी है। चुनाव घोषित होने से पहले और उसके बाद भी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस कोई दीवार ऐसी खड़ी नहीं कर पाए जिसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लांघ नहीं सकते थे। वर्ष २०१४ के बाद देश में हुए विभिन्न चुनावों से कांग्रेस ने एक सबक जरूर लिया है कि वह भाजपा द्वारा लगाए जानेवाले हिन्दू विरोधी पार्टी होने के आरोपर पर रिवेक्ट कर एक्शन में दिखाई देने लगी है। राहुल गांधी द्वारा गुजरात चुनाव में अपनाई सॉफ्ट हिन्दुत्व की नीति से धर्म के आधार पर होने वाले वोटों का धुर्वीकरण काफी हद तक रुका है। भोपाल और इन्दौर जिले में उम्मीदवारों को लेकर कांग्रेस-भाजपा द्वारा अपनाई गई रणनीति से भी इसे समझा जा सकता है। भोपाल की उत्तर विधानसभा सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला धर्म के आधार पर होता था। भाजपा आरिफ अकील के मुकाबले में तिलकधारी हिन्दू नेता को टिकट देती थी। नतीजतन उत्तर से बहने वाली हवा का असर पूरे संभाग की सीटों पर होता था। इसी तरह कांग्रेस इंदौर में अल्पसंख्यक वोटरों के साधने के लिए किसी न किसी मुस्लिम को टिकट देती थी। इस बार कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदली। इसका असर यह हुआ कि इंदौर जिले की चार-पांच सीटें कांग्रेस को मिलने का दावा होने लगा है। राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर जाने से भाजपा को भी अपनी रणनीति में काफी बदलाव करना पड़ा। वैसे भी मध्यप्रदेश में भाजपा यानि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जीत के लिए कोई विशेष रणनीति बनाई भी नहीं थी। जिस कार्यकर्ता की दम पर शिवराज सिंह चौहान, कांग्रेस की चुनौती का सामना करने को तैयार थे, वह कार्यकर्ता भी जीत के अतिविश्वास पर सवार था अथवा प्रचार की मुंह दिखाई कर रहा था। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने पड़ोसी राज्य के नेताओं का उपयोग जरूर किया। लेकिन इन पड़ोसी राज्य के नेताओं की उपस्थिति का कोई असर दिखाई नहीं दिया। वहीं चुनाव में कांग्रेस ने बाबाओं का उपयोग अपनी हिन्दू विरोधी छवि को बदलने के लिए बड़े ही अच्छे ही ढंग से किया। प्रत्यक्ष तौर पर बाबा बनाम शिवराज सिंह चौहान की लड़ाई में कांग्रेस कहीं नहीं थी। कांग्रेस हमेशा की तरह पर्दे के पीछे से भूमिका निभा रही थी। वैसे भी साधु-संतों, बाबा सन्यासियों का राजनीति में दखल भाजपा के कारण ही देखने को मिलता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठन विश्व हिन्दू परिषद भगवा और पीत वस्त्रधारियों बाबाओं के जरिए ही राम मंदिर के मुद्दे पर हिन्दू-मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता रहा है। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले राम मंदिर पर अध्यादेश लाने की उठी मांग का हिन्दुओं के बड़े वर्ग में कोई खास प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। कम्प्यूटर बाबा जैसे लोगों की अपील में टीवी चैनलों की स्क्रीन से बाहर असर छोड़ती दिखाई नहीं दी। कम्प्यूटर बाबा के बागी तेवरों के बाद भाजपा भले ही उन्हें कांग्रेसी बताने से न चूकी हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि बाबा की महत्वाकांक्षाओं को भुनाने की पहल शिवराज सिंह चौहान ने ही की थी। बाबा चुनाव में भले ही लाखों वोट भाजपा के खिलाफ डलवाने का माद्दा न रखते हों, लेकिन उन्होंने माहौल बिगाडऩे में एक आहूति जरूर डाली। कम्प्यूटर बाबा सहित पांच संत और बाबाओं को शिवराज सिंह चौहान ने अप्रैल में राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया था, उनमें भैय्यूजी महाराज भी एक थे। बाबाओं को मंत्री बनाने की कहानी किसी से छुपी हुई नहीं है। नर्मदा की रेत और छ: करोड़ पौधे लगाए जाने की सच्चाई को दबाने के लिए बाबाओं को मंत्री पद दिया गया। छह करोड़ पौध्ेा लगाकर गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराने की कहानी बुक ऑऊफ वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराने की कहानी का चुनावी राजनीति में कोई सकारात्मक असर भाजपा के पक्ष में दिखाई नहीं दिया। नर्मदा पट्टी में शिवराज सिंह चौहान की नर्मदा यात्रा ेस ज्यादा असरदार दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा रही। नर्मदा किनारे रहने वाले लोगों से दिग्विजय सिंह का सीधा संवाद कांग्रेस के लिए चुनाव में काफी मददगार रहा है। अमरकंटक से लेकर बुधनी तक ऐसे कई चेहरों की पहचान वोटर को है जिन्होंने जीवनदायिनी नर्मदा की रेत का व्यापार चोरी कर किया। प्रदेश में रेत सिर्फ नर्मदा से निकाली गई है, ऐसा नहीं है। मध्यप्रदेश की हर नदी से रेत निकाले जाने का काम संगठित तौर पर हुआ है। चंबल में भी रेत निकाली गई और बेतवा भी खाली हो गई है। जिस इलाके में जो सत्ता के करीब है उसने खनन का धंधे को ही लाभ के धंधे के तौर पर उपयोग किया है। खनिज की चोरी करने वालों पर सरकारी मशीनरी का दबाव न होने के कारण जनता ने भी मुंह बंद कर लिया है। बुंदेलखण्ड इलाके में खनन का कारोबार उत्तरप्रदेश के लोग कर रहे हैं। चंबल नदी की रेत के कारोबारी उसी तरह से घाट-घाट पर बदल जाते हैं, जिस तरह से नर्मदा के बहाव के साथ बदल जाते हैं, जिस तरह से नर्मदा के बहाव के साथ बदलते हैं। विधानसभा के इस चुनाव में रेत का कारोबार मुद्दा तो है लेकिन वह अवैध खनन के रूप में नहीं है। महंगा रेत वोटर को विचलित कर रहा है। वोटर का एक ही सवाल है कि क्या रेत के दामों को सरकार नियंत्रित नहीं कर सकती। महंगी रेत का असर सरकारी विभागों के निर्माण खर्च को ही बढ़ा रहा है।
०-सुबह सवेरे से साभार)
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