अब हम चुनाव-पद्धति बदल दें

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०-डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अभी चुनाव का पहला दौर शुरू हुआ है। अभी कई दौर पूरे होने बाकी हैं। इस पहले मतदान में याने सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए। चुनाव आयोग ने लगभग २५००० करोड़ रुपए का माल जब्त किया है, जिसें नकदी, शराब, नशीली दवाईयां बर्तन-भाड़े और ऐसी चीजें हैं, जो नेताओं ने वोटरों को बांटने के लिए जमा की हुई थी। २५ हजार करोड़ रुपए का माल तो वह है, जो पकड़ा गया है। जो नहीं पकड़ा जा सका, जरा उसकी कल्पना तो कीजिए। वह कम से कम एक लाख करोड़ रुपए का भी हो सकता है और यह मतदान का पहला दौर है। अगले डेढ़ माह में यह राशि कई लाख करोड़ तक पहुंच सकती है। दूसरे शब्दों में भारत सरकार जितना टैक्स पूरे साल भर में इकट्ठा करते हैं, उतना पैसा चुनाव के डेढ़-दो माह में हमारे राजनीतिक दल जनता को रिश्वत देने में खर्च कर देेते हैं। चुनाव आयोग ने सांसद के चुनाव में हर उम्मीदवार पर खर्च की सीमा ७० लाख रुपए बांध रखी है। आजकल ७० लाख रुपए तो नगर निगम का उम्मीदवार ही खुद पर खर्च कर देता है। मेरी राय में ७० लाख रुपए भी बहुत ज्यादा है। किसी भी उम्मीदवार के लिए ७० लाख रुपए भी ईमानदारी से जुटाना बहुत मुश्किल है। मेरी राय में किसी भी चुनावी उम्मीदवार के लिए एक लाख रुपए से ज्यादा के खर्च पर पाबंदी होनी चाहिए। स्थानीय निकायों के उम्मीदवारों के लिए यह राशि काफी कम रखी जा कसती है। यह कैसे हो सकता है? क्या विधानसभा और सांसद के उम्मीदवारों पर भी यह पाबंदी लागू होगी? हां, जरूर! इसके लिए यह किया जाए कि हर निर्वाचन-क्षेत्र सिर्फ दस-दस हजार मतदाताओं को बनाया जाए। यदि ऐसा करें तो भारत की संसद में ८० हजार या एक लाख सांसद रखने पड़ेंगे, जो कि व्यावसायिक नहीं हैं। इसी तरह हर विधानसभा में हजारों विधायक हो जाएंगे। तो क्या करें? ऐसे में हम क्या यह नहीं कर सकते कि ढाई लाख पंचायतों और ३२५५ स्थानीय निकायों को यह अधिकार दे दें कि उनके सस्य सांसदों को चुन कर भेजें? यह उसी तरह से अप्रत्यक्ष चुनाव हो जाएगा, जैसे राज्यसभा या विधान परिषदों या राष्ट्रपति पर होता है। भ्रष्टाचार तो इस पद्धति से भी होगा लेकिन आटे में नमक के बराबर होगा। यदि यह मतदान गोपनीय न हो तो यह भ्रष्टाचार रहित भी हो सकता है। भारत-जैसे विशान जनसंख्या वाले देश में चुनाव-पद्धति में मौलिक परिवर्तन किए बिना भ्रष्टाचार को खत्म करना असंभव है। भारत की चुनाव पद्धति ब्रिटेन और यूरोप के छोटे-छोटे राष्ट्रों की नकल पर बनाई गई थी। ये राष्ट्र भारत के कई प्रांतों से भी छोटे हैं। अब इस पर पुनर्विचार की जरूरत है। यदि यही पद्धति चलती रही तो ईमानदार से ईमानदार प्रधानमंत्री को भी बोफोर्स, अगस्ता, वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर, जर्मन, पनडुब्बी और रफाल सौदे में पैसे खाने पड़ेंगे। अगर प्रधानमंत्री लोग डाका डालेंगे तो उनके अधिकारी और चपरासी तक रिश्वत क्यों नहीं मांगेंगे? गंगा की तरह भ्रष्टाचार का नाला भी ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ता है।
०-नया इंडिया से साभार)
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