अपने नहीं केन्द्र के पैसों से चल रही है प्रदेश सरकार

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। देश में वर्ष २०१४ में लोकसभा के चुनाव हो रहे थे उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के मतदाताओं को अपनी हर सभा में यह आश्वासन देते हुए नजर आ रहे थे कि यदि राज्य और केन्द्र में एक ही पार्टी की सरकार होगी तो इस प्रदेश के विकास की गति दोगुनी हो जाएगी और यूपीए सरकार की तरह उसे विकास के लिये पैसों की कमी नहीं आएगी लेकिन २०१४ के लोकसभा चुनाव के बाद राज्य के साथ-साथ केन्द्र में भी भाजपा की सरकार काबिज हो गई लेकिन इन चार वर्षों में ऐसा कुछ नजर नहीं आया कि केन्द्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने के चलते राज्य के विकास में कोई गति आई। हाँ, यह जरूर है कि लोकसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मन में भाजपा के वह नेता जो आज नरेन्द्र मोदी के मंत्रीमण्डल में मंत्री हैं उन सभी ने लालकृष्ण आडवाणनी की शह पर शिवराज सिंह चौहान को मोदी की बजाए प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने का ख्वाब दिखाया था वह ख्वाब नरेन्द्र मोदी की रणनीति के आगे शिवराज का भले ही पूरा न हो पाया हो लेकिन आज भी शिवराज सिंह की जो कार्यशैली है उस कार्यशैली के चलते अपनी कुर्सी बचाओ ओर उच्च पद पाने की लालसा में करोड़ों रुपये अपनी छवि बनाने के फेर में प्रदेश के साथ-साथ देश और दुनिया में मीडिया को जारी किये जाने वाले विज्ञापनों पर खर्च हो रहे हैं लेकिन कर्जदार प्रदेश के खाली खजाने से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये के मुख्यमंत्री की छवि बनाने के करोड़ों रुपये के विज्ञापन तो जरूर जारी हुए लेकिन न तो मुख्यमंत्री की छवि बन पाई और न ही प्रदेश का कागजों की बजाए जमीनी स्तर पर कोई विकास हुआ। लेकिन इन सबके साथ ही अब मुख्यमंत्री इन सबसे प्रदेश की जनता का ध्यान हटाने के लिये यूपीए सरकार के समय की तरह धरना-प्रदर्शन और उपवास की नौटंकी भी नहीं कर पा रहे हैं। जैसा कि केन्द्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान वह अक्सर किया करते थे और कम फण्ड मिलने का ढिंढोरा पीटकर कभी कोयला न मिलने तो कभी मनरेगा या केन्द्रीय करों में कम राशि मिलने की वजह से आन्दोलन की धमकी दिया करते थे आज उनकी यह स्थिति हो गई कि जबर मारे और रोने न दे, क्योंकि लोकसभा चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने का जो सपना भाजपा के कुछ नेताओं के उसकाने पर संजोया था उसका खामियाजा भी अब प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है और राज्य को यूपीए सरकार की तुलना में मुख्यमंत्री के उस दावे के विपरीत जो उन्होंने प्रदेश की जनता को लोकसभा चुनाव के पूर्व खूब ढिंढोरा पीटा था कि यदि केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होगी तो राज्य का विकास होगा अब ऐसा ही नजर आने लगा है और मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार केंद्र के भरोसे ही चल रही है। क्योंकि मप्र सरकार द्वारा स्वयं के करों से मिलने वाली राशि से ज्यादा तो वेतन-भत्ते, कर्ज और ब्याज की राशि पटाने पर ही खर्च हो जाते हैं और हर वर्ष केन्द्र से ४० से ४५ हजार करोड़ की राशि फंड और केन्द्रीय करों के हिस्से में मिलती रही है, जो आज बढ़कर ७७ हजार १४० करोड़ में पहुंच गई है, फिर भी इस साल केंद्र से लगभग १३ हजार करोड़ रुपए नहीं मिल सके हैं। यूपीए सरकार के दौरान भी मप्र को वर्ष २०१३-१४ में ३४ हजार ४९१ करोड़ रुपए मिले थे और उससे पहले भी भरपूर फंड मिला। यही वजह है कि सरकार ने अब आयोजनेत्तर और आयोजना मद को एक कर दिया है। केंद्र में यूपीए सरकार में यदि किसी वर्ष कम फंड मिलता था, तो राज्य सरकार आंदोलन करने खड़ी हो जाती थी, कभी कोयला नहीं मिलने, तो कभी मनरेगा या केंद्रीय करों में कम राशि मिलने की वजह से आंदोलन करती रही है, लेकिन वर्तमान में तो केन्द्र में भाजपा की सरकार होने के बाद भी मप्र को १३ हजार करोड़ की राशि नहीं मिल सकी। पहले केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा ३२ प्रतिशत हुआ करता था, जो आज आगे बढ़कर ४२ प्रतिशत हो गया है। साथ ही जीएसटी लागू होने के बाद कम टैक्स मिलने पर अतिरिक्त राशि देने का प्रावधान अगले पांच साल तक के लिए किया गया है, फिर भी मप्र की वित्तीय स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। स्वयं के करों से मप्र को पचास हजार २९५ करोड़ तथा करेत्तर राजस्व के रूप में ११ हजार ६७९ करोड़ की राशि मिलनी थी, मगर राज्य सरकार के स्वयं के करों से इस साल ४३ हजार करोड़ ही मिल सके। जबकि सरकार को हर वर्ष वेतन-भत्तों के रूप में २८ हजार ५४२ करोड़, ऋण पर ब्याज भुगतान के रूप में ११ हजार ९६४ करोड़ तथा पेंशन के रूप में दस हजार ५५ करोड़ की राशि इसी साल खर्च करने जा रही है, जबकि अगले साल इसमें दस प्रतिशत तक वृद्धि होने जा रही है।

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