अपनी सल्तनत को बचाने के लिये अब भूरिया क्या खेल खेलेंगे ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। मध्यप्रदेश में १५ सालों का वनवास भोगकर सत्ता में आई कांग्रेस जो हर विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के मतों की बदौलत अनेकों विधानसभा सीटें पाती रही है, एक समय था जब आदिवासियों में कांग्रेस की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इंदिरा मैया तो वहीं राजीव गांधी को मोटा बाबू के नाम से जाना जाता था लेकिन इसके बाद कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जिसने प्रदेश के आदिवासियों में अपनी छवि बनाई है, हालांकि कांग्रेस के लोग झाबुआ संसदीय सीट पर वर्षों तक काबिज रहे, कांतिलाल भूरिया को बड़ा आदिवासी नेता मानते हैं, लेकिन बात जहां तक भूरिया की की जाये तो भूरिया हमेशा सत्ता की बदौलत ही अपनी राजनीति चमका पाए हैं। उनके अपने क्षेत्र में इस बात को लेकर भी चर्चा का विषय है कि भूरिया लम्बे समय तक झाबुआ संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे तो वहीं राज्य के मंत्रिमण्डल का भी सुख उन्होंने भोगा, लेकिन बात जहाँ तक उनके क्षेत्र के विकास की करें तो भाजपा शासनकाल आने के पूर्व जितनी राशि आजादी के बाद उस झाबुआ जिले के विकास के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा आंवटित की गई यदि उस राशि को जिले के आदिवासियों को दे दी जाती तो शायद उनका स्वयं का विकास हो जाता लेकिन लम्बे समय से भूरिया के कब्जे में रहने के बाद भी संयुक्त झाबुआ जिले और वर्तमान में अलीराजपुर और झाबुआ में हमेशा विकास से जूझता रहा। लेकिन १५ वर्षों के भाजपा शासनकाल में जो विकास झाबुआ का हुआ और उन आदिवासी लोगों को भाजपा के शासनकाल में जिनके पूर्वज टपरों में रहकर अपनी जिंदगी गुजार गये, जब प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत हजारों आवास उन आदिवासियों को मिले तो उनका प्रेम भाजपा की ओर बढऩे लगा। मजे की बात तो यह है कि भूरिया वर्षों तक सांसद और विधायक रहे लेकिन उसी झाबुआ जिले के भाजपा शासनकाल में मुख्य बजट में झाबुआ जिले के विकास के लिये आवंटित राशि का चुपके से भोपाल और अन्य शहरों के विकास के लिये निकाल ली गई, लेकिन कांतिलाल भूरिया ने इसके खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाई, जबकि उनके पड़ोस के जिले बड़वानी के कांग्रेसी विधायक बाला बच्चन ने इसकी खोज की और इसका खुलासा किया लेकिन उसके बाद भी भूरिया भाजपा शासन के खिलाफ उनके जिले के आदिवासियों के हक पर डाका डालने को लेकर आंदोलन नहीं चला पाए। बाद यदि झाबुआ जिले के विकास की करें तो चाहे कांग्रेस के शासन हो या भाजपा का इस जिले में हमेशा शराब के अवैध कारोबार का बर्चस्व रहा, लेकिन भूरिया ने कभी शराब के अवैध कारेाबारियों के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं चलाया। हां, भाजपा शासनकाल में कलावती भूरिया ने जरूर अवैध शराब के कारोबारियों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन और आंदोलन की चेतावनी तो दी लेकिन वह भी शराब माफियाओं के सामने थोड़ा बहुत हंगामा करके चुप्पी साध गई । कांतिलाल भूरिया हमेशा सत्ता के बदौलत ही राजनीति करते हैं और जब प्रदेश में १५ वर्षों के कांग्रेसियों के वनवास के बाद कमलनाथ की सरकार बनी तो उन्होंने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया और अपने क्षेत्र में भाजपा के एक नेता के रूप में सशक्त प्रत्याशी जीएस डामोर को सक्रिय होते देख भूरिया को अपनी सल्तनत ढहती नजर आई और वह सक्रिय हुए तो उन्होंने सत्ता के अहम में आकर जिस विभाग से सेवानिवृत्त हो अपने ही जिले में राजनीति के अखाड़े में उतरने वाले डामोर को भूरिया ने घेरना शुरू किया और वर्षों पुराने जीएस डामोर के समय हुए घोटाले पर धुंध छानने की कोशिश में लग गए और आखिरकार वह डामोर का कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो उनके पूर्व विभाग के तत्कालीन मुखिया केके सोगरिया को हटाकर उन्होंने इस बात का आरोप जड़ा कि हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनाव के दौरान डामोर को चुनावी फण्ड उपलब्ध कराने में मदद की और इसका लाभ वर्तमान पीएचई के मुखिया सीएम संकुले को बनाने में सफलता हासिल की हालांकि इस सफलता के पीछे क्या कुछ हुआ यह तो सांकुले और कांतिलाल भरिया ही बता सकते हैं लेकिन सत्ता के अहम में अपने प्रतिबद्वंदी जीएस डामोर पर कुछ नहीं कर पाए और खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर विभाग में परिवर्तन तो कर दिया लेकिन विभाग में हुए परिवर्तन के बाद जो खामियाजा आज प्रदेश की जनता को जल संकट के रूप में जूझना पड़ रहा है उसके पीछे भूरिया की अपनी राजनीति महत्वाकांक्षा को विभाग के लोग जिम्मेदार मान रहे हैं बात जहां तक डामोर की है, तो डामोर ने पीएचई विभाग की मुख्य अभियंता से सेवा निवृत्त होने के बाद चंद दिनों में झाबुआ जिले के मतदाताओं में अपनी पैठ बनाई यही नहीं कुछ दिनोंं बाद हुए लोसकभा चुनावा में रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट से विजयी होकर वह सांसद भी बन गए, डामोर ने जहाँ केवल सत्ता की दम पर राजनीति करने वाले कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रम भूरिया को विधानसभा चुनाव में पराजित किया तो लोकसभा चुनाव में स्वयं कांतिलाल भूरिया को पराजित तो किया, लेकिन लोग कांतिलाल भूरिया की हार के पीछे उनके अपनी सत्ता की बदौलत राजनीति करने और अपने मतदाताओं से दूरी बनाने के साथ-साथ क्षेत्र के विकास में रुचि न लेना भी एक अहम कारण है, यही वजह है कि झाबुआ में विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में पिता-पुत्र भूरिया की पराजय के बाद अब कांग्रेस भूरिया के रूप में नये आदिवासी चेहरे की तलाश में लग गई है, क्योंकि कांग्रेस अपने को आदिवासी मतदाताओं से जुड़े रखना चाहती है जो पूरे प्रदेश के आदिवासियों में सर्वमान्य हो। अपनी आदिवासियों में कमजोर स्थिति को देखते हुए कांग्रेस के अंदर अब भूरिया की बजाय अब नये चेहरे की मांग उठना शुरू हो गई है, हालांकि कमलनाथ के मंत्रिमण्डल के सदस्य और उनके अपने खास समर्थक लोक निर्माण मंत्री सज्जन वर्मा ने पिछले दिनों गृह मंत्री बालाबच्चन का नाम आगे बढ़ाते हुए यह दावा किया कि बाला बच्चन एक अनुभवी नेता हैं और वह आदिवासी नेताओं में शुमार हैं। पता नहीं सज्जन वर्मा का यह तर्क उनके नेता कमलनाथ को भाता है या नहीं यह तो समय बतायेगा? लेकिन राज्य की कांग्रेस के पास वैसे कोई सर्वमान्य आदिवासी नेता नहीं है, बात जहां तक कांतिलाल भूरिया की करें तो वह भी सिर्फ एक सीमित क्षेत्र के नेता हैं लेकिन फिर भी वह और उनकी पार्टी उन्हें आदिवासियों का सर्वमान्य नेता मानकर चलती है जबकि भूरिया की राजनीति सत्ता के दम पर ही चलती रही है और पिछले १५ वर्षों से अपने ही संसदीय क्षेत्र में भाजपा के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन न करने वाले भूरिया के पुत्र को जब विधानसभा चुनाव में पीएचई विभाग से सेवानिवृत्त हुए जीएस डामोर ने पराजय का स्वाद चखाया तो भूरिया को बेटे के बाद अपनी सल्तनत भी खिसकती नजर आई और उन्होंने डामोर के शासकीय सेवा के दौरान कुछ पुराने वह मुद्दे उखाडऩे की कोशिश की जिन मुद्दों हर जाँच के बाद भी बेअसर साबित हुए, जब वह डामोर को कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो उनके विभाग के तत्कालीन मुखिया के सोनगरिया जिनके कार्यकाल में इससे भी कम प्रदेशभर में पड़े सूखे की समस्या का हल बिना किसी हो हल्ला के सोनगरिया की कार्यशैली के चलते जल संकट की समस्या का हल किया गया था इसी उधेड़ बुन में सोनगरिया के स्थान पर भूरिया की प्रतिद्वंदी राजनीति के चलते पीएचई विभाग के सीएम संकुले को विभाग का मुखिया तो बना दिया लेकिन वर्तमान में पड़े भयंकर सूखे का सामना करने में संकुले असफल साबित होते नजर आ रहे हैं, विभागीय सूत्रों पर यदि विश्वास करें तो भूरिया की राजनीति की बदौलत जिन सोनगरिया को मुख्य अभियंता के पद से हटाया गया वह अपने पद से हटाये जाने से पूर्व पिछले वर्ष की तरह जल संकट की स्थिति से निपटने के लिये सारी कार्य योजना बनाकर गये हैं, लेकिन अब उसका क्रियान्वयन किया जाना था लेकिन संकुले द्वारा उसका क्रियान्वयन ठीक से क्यों नहीं किया जा रहा है इसको लेकर क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा इसको लेकर विभाग में तरह-तरह की चर्चाएं व्यापत हैं तो वहीं इस जलसंकट के लिये जहाँ भूरिया की राजनीति को लोग दोषी मान कर चल रहे हैं। कांतिलाल भूरिया जीएस डामोर के सांसद बनने के बाद विधायक पद से इस्तीफा देने की वजह से होने वाले उपचुनाव के लिए स्वयंं एक बार फिर झाबुआ में चुनाव लडऩे की तैयारी में भिड़ गए हैं। १९८० में कांग्रेस की झाबुआ में राजनीति भूरियाओं के भरोसे ही रही है लेकिन झाबुआ की चाहा। अब किसी नये चेहरे की तलाश में ळै, वह डामोर की जीत ने साबित भी कर दिया है। कमलनाथ के लिए अपनी सरकार को बहुमत में बनाए रखना हर हाल में जरूरी है लेकिन क्या वे इसके लिए कांग्रेस को भूरियाओं के मोहपाश से मुक्त कराकर इनसे इतर किसी अन्य चेहरे को टिकट दिलाकर उपचुनाव लड़ाकर जिता पाते हैं, या नहीं इस पर भी उनकी सरकार की तो तात्कालिक राहत मिली है वह कायम रह पाएगी। यदि कांग्रेस भूरिया परिवार से बाहर उम्मीदवार नहीं बना पाती तो फिर हो सकता है भाजपा एक बार फिर कांग्रेस के किसी चेहरे को अपना उम्मीदवार बनाकर दलबदल का तड़का लगाते हुए इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने की कोशिश करे। झाबुआ में १९७० से दिलीप सिंह भूरिया और कांतिलाल भूरिया के इर्द-गिर्द ही कांग्रेस की राजनीतिक घूमती रही है। जब तक दिलीप सिंह भूरिया कांग्रेस में रहे तो वे सांसद रहे और जब वे भाजपा में चले गए तो उन्हें हराकर कांतिलाल भूरिया राज्य की राजनीति छोड़कर लोकसभा में जा पहुंचे। २०१४ में दिलीप सिंह भूरिया की किसमत ने जोर मारा और मोदी लहर में वे भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव जीते लेकिन उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी बेटी निर्मला भूरिया को पराजित कर कांतिलाल भूरिया को पराजित कर कांतिलाल भूरिया लोकसभा पुन: पहुंच गए। इस बार हुए लोकसभा के आमचुनाव में डामोर ने उन्हें यहाँ से पराजित कर दिया। कांग्रेस की एक कमजोरी यह भी रही कि एक बार स्थापित हो चुके आदिवासी परिवारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही जबकि समय की मांग है कि नया नेतृत्व पैदा किया जाए। वहीं आदिवासी इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत करने में भाजपा इस कारण ही सफल रही कि उसने नये लोगों को नेतृत्व का मौका दिया। अर्जुन सिंह जब प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उस दौरान उन्होंने जरूर स्थापित आदिवासी परिवारों के नेताओं से इतर नया नेतृत्व जगह-जगह तैयार किया और उसकी बदौलत ही कांग्रेस की मजबूती पकड़ बनी रही। राज्य में आदिवासी वर्ग की लगभग २२ प्रतिशत आबादी है। विधानसभा के ४७ क्षेत्र इस वर्ग के लिए आरक्षित हैं। वर्ष २०१८ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन ४७ में से ३० इलाकों में जीत दर्ज की थी। आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित क्षेत्रों में से ६० प्रतिशत से ज्यादा स्थानों पर कांग्रेस को सफलता मिली थी। इसी तरह कांग्रेस के ११४ विधायकों में से २५ प्रतिशत से ज्यादा इस वर्ग के हैं। विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस की आदिवासी इलाकों में सफलता मिली, वहीं लोकसभा चुनाव में उसे इस वर्ग की एक भी सीट हासिल नहीं हो पाई। आदिवासियों के बीच से ऐसे नेता को निकलना चाह रही है, जो पार्टी के भीतर और बाहर आदिवासियों का प्रतिनिधि नजर आए। उसका अंदाज रहन-सहन से लेकर बोलचाल भी आदिवासियों जैसा हो। कांग्रेस के नेता मानते हैं कि यह काम आसान नहीं है, मगर इस वर्ग में पकड़ रखने के लिए जरूरी हे कि खांटी आदिवासी नेता खड़ा किया जाए।

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